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दुआ

 

 

दुआओं के दरवाज़े बंद हो गए
वो जब हमसे दूर हो गए
मौजूद ना होकर भी उन्हें महसूस करते हैं हम
उनकी एहमियत का एहसास आज करते हैं हम
ज़िन्दगी में वो पहले सा जोश ना रहा
कुछ करने का वो वलवला न रहा
उनके गिर्द ही थीं जैसे सारी ख़ुशियाँ
हमसे रूठी सी हैं अब जैसे सारी ख़ुशियाँ
अब तो बस यही दुआ है लब पर
जन्नत की बहारें मिलें उन्हें तेरे दर पर

 


(इरम कमाल)

 

 

 

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