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दुनिया

 

 

जाने कैसी दुनिया रे
सब दौड़े ही जाते हैं
जीवन दौड़ में मगर
खुद को खो जाते है

 

 

लड़ते है तिनके पर
तिनका ही संजोते है
मानव-धन जैसा धन
वो हाँथो से बहाते है

 

 

जीवन को अमर मान
धन वो खूब जुटाते है
इक रोज मौत के संग
लिपटकर सो जाते है

 

 

अर्थ हीन है ये दुनिया
यदि खुद को गवाओगे
एकत्व दर्श रख देखो
सब में ही ईश्वर पाओगे

 

 


©प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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