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इच्छा

 

 

 

इच्छाए कभी ख़त्म नहीं होती,
तमन्नाये कभी ख़त्म नहीं होती !
एक पूरी होती है तो दूजी उत्पन्न हो जाती है,
है ये एक ऐसी उलझन !
जो कभी ख़त्म नहीं होती,
इच्छाओ का जन्म होता है कैसे !
इच्छाओ की जननी होती है कौन,
इच्छाओ से ही संसार चले !
कामनाओ से ही संसार बसे,
जन्म लेती अमृत पीकर !
मरती नहीं विष को भी पीकर,
इनके लिए मानव क्या क्या करे !
कभी लड़े तो कभी झगडे,
इससे बन जाते मित्र !
इससे बन जाते दुश्मन,
ये बर्बाद करती जिंदगी तमाम !
खुशिया मार देती तमाम,
इससे हार, मानव क्या नहीं करता !
मन में बसाकर सदैव ही रखता,
इससे बनते अपने पराये !
इसीसे बनते पराये अपने,
इन्हें कोई मार नहीं सकता !
इनसे बचके कोई जा नहीं सकता,
ये नाजुक कलिया खिलती है ऐसी !
एक बार खिले तो मुरझाये नहीं,
ये होती है रितुओ की तरह !
ये होती सदाबहार की तरह,
इनसे हम लड़ नहीं सकते !
इनके बिना हम जी नहीं सकते,
ये लाती कभी जीवन में बहार !
ये रुलाती जीवन में बार बार,
ये तो है वो डालिया !
जो कटे तो भी खिले बार बार !!

 

 

 

meri ye kavita mere swargiya pitaji ki yaad gari me

 

Rohini Tiwari

 

 

 

 

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