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आज भी हमारे देश में लड़कियो की उपेछा की दृष्टि से देखा जाता है..

उनको पराया समझा जाता है , समाज आज भी अपने पुराने रीती रिवाजो में उलझा हुआ है.

वो हमारे हर रिश्तों में चाहे एक माँ हो या , बहन ,संगिनी या दोस्त हर रिश्तों में स्नेह बरसाती है,

जीवन के किसी रंगों में कुछ विचारें उठी जो आप से मुझसे सबसे जुरी है ...

नन्ही नन्ही कदमें जब आंगन में चलती है,

कभी पायल की रुनझुन यूँ कानो में परती है,

वो बचपन की किलकारी मन में समायी होती है ,

एक गुड़िया परायी होती है ,

लगर झगर के बच्चो से जब ऑंखें उसकी रोती है,

उस मनहारी सूरत को आंसू जब भिगोती है,

तब लपक झपक के एक ममता सीने से पिरोती है,

एक गुड़िया परायी होती है ,

मन की बातें मन में रखकर ,

जब वह घुट घुट के जीती है ,

कुछ न कहकर सब सहकर,

जब वो थोरी सी हँस लेती है,

एक गुड़िया परायी होती है ,

हर रिश्तों को वो तो दिल से यूँ संजोती है,

कभी आँचल में , कभी ममता में , कभी बंधन में,

कभी उलझन में बस स्नेह ही स्नेह बरसती है,

अपने खातिर वो बस, एक गुड़िया परायी होती है !

कहने को हम कह देते सब रीत पुरानी होती है,

फिर भी इस जग की एक रोज नयी कहानी होती है,

एक गुड़िया परायी होती है ,

 

 

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