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ये एक जुटता अगर ऐसे ही कायम होती गयी
मरती परिभाषाओं को सांस मिलेगी जरूर ,
वृक्ष भलें ही ना उखाड़ सकें तानाशाही का
मगर जड़ कहीं न कहीं उसकी हिलेगी जरूर ,
इस शोर के पीछे एक तड़प है ,दबा गुस्सा है
पता था ये चिंगारी भी कभी सुलगेगी जरूर ,
सांझी तकलीफ ने दिया जैसे हाथों में हाथ
दर्द की और जमी नदियाँ भी पिंघलेगी जरूर ,
किसी की भूख जगा रही है किसी की सोई भूख
इस भूख से कोई तो प्यास भी निकलेगी जरूर ,
थक गए थे मरे सपनों को कफ़न ओढ़ाते-ओढ़ाते
अब बईमानी पे कोई चादर तो सिलेगी जरूर


vaishali bhardwaj (pinchu sharma)

 

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