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एक तू ही नारी

 

naari

 

सृजन क्षितिज की नभचारी , देवोँ को भी तू ही न्यारी , सागर के मंथन से
आयी , दानवोँ को तू ने ललचायी ।

 

वाग वाग विरान पड़ा है
क्योँ मुड़झाने को खड़ा है कली कली सी दिखने वाली चंदन सी महकने वाली ,
धूल को भी सिमटने वाली कोई नहीँ एक तू ही नारी ।
जा रव से पूछ मतवाली क्योँ करते हो आदि से रखवाली ,
सुर असुरोँ को भायी , जग मेँ ऊँची छलांग लगायी
कठोर तप करने वाली
हर कष्ट को सहने वाली कोई नहीँ एक तू ही नारी । डाल डाल सूखने को चली
है फिर भी पुरुषार्थ को सीँचने मेँ लगी है ।
सुखा , टुटा , मुरझाया अपने को सहने मेँ रुलाया , मैँ को हो न सका
अनुकूल , इस स्वार्थी ने बनाया प्रतिकूल ।
जग निराली सृजन वाली कोई नहीँ एक तू ही नारी ।

 


संजय कुमार अविनाश

 

 

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