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फरेब

 

 

नादानी थी मुझमें सादगी के साथ,
वो खेलती रही मेरी जिंदगी के साथ।

 

मैं गाफिल उसको खुदा मान बैठा,
उसी को सोचता था बन्दगी के साथ।

 

आजकल अँधेरे में टूटा सा रहता हूँ,
वो ख़्वाब दिखाती थी रोशनी के साथ।

 

दिल दुखाने तक बात संभाल लेता,
धोखा भी किया उसने दिल्लगी के साथ।

 

कुछ चीजें मुझे देर से समझ आई,
वो मुखौटा पहनती थी ओढ़नी के साथ।

 

आज उसने किसी और का हाथ थामा था,
दुआ है फरेब ना हो उस आदमी के साथ।

 

 

©डीजे

 

 

कवि परिचय
नाम-दिनेश कुमार 'डीजे'

 

 

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