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वो नन्हीं सी फ्रांक !

 

 

बाजार में देखकर जिसे
मन फिसल गया था
एक बार खरीदने को
दिल मचल गया था
कहाँ गई आज प्यारी
वो नन्ही सी फ्रांक?
मां को उंगली से
करती रही इशारा
जब तक न उसने दुकानवाले को पुकारा
ज़िद से खरीद लाई
वो नन्ही सी फ्रांक
कहाँ गई आज प्यारी
वो नन्ही सी फ्रांक?
पहन कर जिसे मैं
चहक गई थी
फूलों की ख़ुशबू से
महक गई थी
दिनभर न उतारी थी
वो नन्ही सी फ्रांक
कहा गई आज प्यारी
वो नन्ही सी फ्रांक?
सारे मुहल्ले में बताया
हर किसी को दिखलाया
मन सभी के भाई
वो नन्ही सी फ्रांक
कहाँ गई आज प्यारी
वो नन्ही सी फ्रांक?
कई रंगों से रंगी
फ्रांक थी जैसे कोई संगी
उसके आगे मेरी हर फ्रांक
हो गई बेरंगी
दे गई खुशियाँ सारी
वो नन्ही सी फ्रांक
कहाँ गई आज प्यारी
वो नन्ही सी फ्रांक?
एक दिन न जाने कब मैं बड़ी हो गई
नाजुक से कदमो पर खड़ी हो गई
फिर मुझको न आई
वो नन्ही सी फ़्रांक
कहाँ गई आज प्यारी
वो नन्ही सी फ्रांक?
जी में आता है फिर से बचपन में जाऊं
पहन वो फ्रांक मैं इठलाऊँ बलखाउँ
आज बहुत याद आई
वो नन्ही सी फ्रांक
बसती थी जिसमे जां हमारी
वो नन्ही सी फ्रांक
कहाँ गई आज प्यारी
वो नन्ही सी फ्रांक?

 

 

किरन देवी

 

 

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