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ग्राम्य-बाला

 

gramyabala


"यह भारत ग्रामों का है देश जिसकी संस्कृति विराट-उज्जवल,
उसमें छत्तीसगढ़ लखे विशेष, जहां की जनता बहुत सरल।

 

जग की रचना के दो उपकरण, पुरूष के संग धीर पुरूषार्थ,
कदाचित पुरूषों में कोई स्वार्थ, नारी का कार्य मात्र परमार्थ।

 

समझे जो इसे हेय वह मूर्ख, सदा से शोषित फिर भी बल,
उपेक्षा सहे बिना प्रतिकार, हृदय जिसका उज्जवल-निर्मल।

 

लज्जा और शील निरख अतुलित, है समझे मूर्ख जिसे अबला,
कार्य अनवरत करे श्रमसाध्य, संत जानें वह है सबला।

 

सृष्टि की रचना का जो मूल, जन्म देना है जिसका काम,
जीवों का जो करती सम्मान, जगत में उंचा जिसका नाम।

 

नारी-शक्ति की क्या तुलना, रखे जो जीव समेटे गर्भ,
वही सार्थक जीवन भावार्थ, वही सम्यक जीवन संदर्भ।

 

कभी वह तान ददरिया की, कभी है वह मांदर की थाप,
कभी वह करमा का संगीत, कभी नेवराती मंतर जाप।

 

कभी वह पनघट का सौंदर्य, सुरीली बंसी की वह तान,
गोपी सम कृष्ण-कन्हैया की, जाती है जो प्रतिदिन गौठान।

 

कभी वह सीता माता सम, कभी वह राधा का प्रतिरूप,
कभी गृहलक्ष्मी धन-वैभव, कभी वह जोगन मीरा धूप।

 

छत्तीसगढ़ की बाला सरला, जिसकी बातों में सम्मोहन,
धिक्कार है ऐसे लोगों पर, करें जो खनिज भूमि दोहन।

 

पालना सत्य धरे जो धर्म, जिसकी सेवा-सुश्रुषा निष्काम,
शक्ति का शक्ति देना काम, ग्राम्यबाला है उसका नाम।

 

स्वाभिमानी मन की देवी, क्रोध जिसका भड़की ज्वाला,
अरूणाई ज्येष्ट मास की जो, मेरे भारत की ग्राम्य-बाला।।"

 

 

 

 

 

संजय कुमार शर्मा

 

 

 

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