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ग्रीष्म वर्णन

 

 

प्रसारती आज पावस पूर्ण बल को
तपा रही है आज पूरे अवनि तल को।
दर्शाते हुए उष्णता अपनी प्रखर
झुलसा रही वसुधा को लू की लहर।।1।।

 

तप्त तपन तप्त ताप राशि से अपने
साकार कर रहा है प्रलय सपने।
भाष्कर की कोटि किरणें भी आज
रोक रही भूतल के सब काम काज।।2।।

 

कर रहा अट्टहास ग्रीष्म आज जग में
बहा रहा पिघले लावे को रग रग में।
समेटे अपनी हंसी में जग रुदन
कर रहा तांडव नृत्य हो खुद में मगन।।3।।

 

व्यथा से व्याकुल हो रहा भू जन
ठौर नहीं छुपाने को कहीं भी तन।
त्याग आवश्यक कार्य कलाप वह सब
व्यथा सागर में डूबा हुआ है यह भव।।4।।

 

झुलसती भू सन्तान ग्रीष्म प्रभाव से
द्रुम लतादिक भी बचे न इसके दाव से।
झुलसाते असहाय विटप समूह को
बह रहा आतप ले लू समूह को।।5।।

 

हो विकल पक्षी भटक रहे पुनि पुनि
त्याग कल क्रीड़ा अरु समधुर धुनि।
अनेक पशु टिक अपने लघु आवास में
टपका रहे विकलता हर श्वास में।।6।।

 

शुष्क हुए सर्व नदी नद कूप सर
दर्शाता जलाभाव तपन ताप कर।
अति व्यथित हो इस सलिल अभाव से
बन रहे जन काल ग्रास इस दाव से।।7।।

 

खौला उदधि जल को भीषण ताप से
झुलसा जग जन को इस संताप से।
मुदित हो रहा ग्रीष्म अपने भाव में
न नाम लेता 'नमन' का अपने चाव में।।8।।

 

 

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

 

 

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