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हक़ीक़त

 

 

बोझ अपना सबको ख़ुद उठाना है,
क़ब्र में सबको अकेले जाना है।
रंगीनियों में दुनिया की रंगने से पहले,
सोच ले यहाँ दो दिन का ठिकाना है।
मत इतरा अपनी ऐशगाहों पर,
इस सब को तहस-नहस हो जाना है।
हिक़ारत से दूसरों को देखने वालों,
इन आँखों को भी बंद हो जाना है।
बिना परों के जो तू उड़ता फिरे,
इस उड़ान पे भी बन्ध बंध जाना है।
छोटे मुँह से बड़ी बात करने वालों,
इस जुबां पे भी लगाम लग जाना है।
दूसरों पर इल्ज़ाम लगाने से पहले,
जान ले अपना किया ही साथ जाना है।
सोच ले यहाँ दो दिन का ठिकाना है,
क़ब्र में सबको अकेले जाना है।

 


(इरम कमाल)

 

 

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