tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






जाम हर रोज़..

 

"जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है,
पीता हूँ मैं, मिरा दुनिया में नाम होता है,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।

 

सोते पी ले, उठते पी ले, तू ज़िन्दग़ी जी ले,
जामो मै से फटते ज़ख़्म तू अदद सी ले,
मर्ज़ जो भी हो, ज़ाम से आराम होता है,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।

 

मिले वहाँ, मेरे हर मर्ज़ की दवा है जो,
मिले वहीं, मेरा अजीज़ोहमनवाँ है जो,
रु-ब-रु 'राज़', मुझसे सुबहोशाम होता है,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।

 

आदमी, आदमी का ख़ून पी रहा है यहाँ,
हर तरफ़ मतलबी हैं लोग 'राज़' जाउँ कहाँ,
मेरा रस्ता नशा, मैक़दा मकाम होता है,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।

 

पीना है रोज़ अगर, दोस्त! मेरी बात सुनो,
रखो जिगर ज़हर पीने का, सूफ़ी ज़ात चुनो,
मैक़दे में, कैसा भी ग़म, तमाम होता है,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।

 

हर इक शबनम शराब का, आबेज़मज़म जैसा,
हलक़ से उतरे ज़िगर में, मिरे हमदम जैसा,
मुझे मैख़ाने का भी एहतराम होता है ,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।

 

रगों में बह रहा लहू की जगहा जाम मिरे,
दे दे मुझको शराब, बनते बिगड़े काम मिरे,
हर एक बूंद में, मै के, पयाम होता है,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।

 

मेरी साक़ी, रहे ख़ामोश है, मैख़ाने में,
इश्क़ ही इश्क़ लिए मै, उसके पैमाने में,
उसकी ख़ामोशी में भी इक सलाम होता है,
जाम हर रोज़ मुझसे हमक़लाम होता है।।"

 

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

HTML Comment Box is loading comments...