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हे ब्रह्मा! मैं सरस्वती

 

hebrahma

 

 

"हे ब्रह्मा! मैं सरस्वती, तुम
तत्पर रचना करने को,
और मेरी नारी आतुर है,
चित्रों में रंग भरने को,

 

हे वासुदेव! धन-धान्य अंग-
प्रत्यंग, सदा सेवा तत्पर,
मैं आदिशक्ति क्रीड़ा उत्सुक,
दिन-मास-वर्ष-युग-संवत्सर,

 

शक्ति बिना शिव निरे अधूरे,
बिन शिव, शक्ति अशक्त,
काम योग, नहिं भोग,
जानता मैं, भोले का भक्त,

 

अहा! पुरुष में कामदेव
संचारित, विरह प्रकोप,
नारीदेह में रति हलचल,
कर दे लज्जा का लोप,

 

हे राम! तुम्हारी सीता मैं,
रावण सम बिरहा की रातें,
कैसे विस्मृत करे जानकी,
तेरी प्यार भरी बातें,

 

हे नर! मर्यादित बढ़ो, थाम लो
हाथ मेरा, श्रृंगार करो,
लीला पुरुषोत्तम श्याम सलोने,
राधा का सत्कार करो,

 

अहा! सुनो तनताप नवतपा,
जलता जग, उन्मादित भग,
मैं गोपी सम ठगी रह गई,
हँसता वृन्दावन में, ठग,

 

कामोन्मत नर वृषभ ढूंढता,
कामधेनु पग-पग, घर-घर,
रत्याच्छादित मेघ नारि,
आ गई बरसने बंजर पर,

 

हे इन्द्र! अप्सरा मैं तेरी,
स्वर्गों का सुख देने वाली,
सुनो तनिक सीने से लग,
क्या कहती होठों की लाली,

 

दुष्यंत! तेरी मैं शकुन्तला, पर
मुझे न क्षण भर तजना तुम,
हे बंशी। स्वर्गिक ध्वनि तुम में,
मेरे अधरों में बजना तुम,

 

नारी नर में, नर में नारी
है, ज्यों सागर में नील,
मेरा काम, निष्काम प्रेम
और संजय लिखता श्लील,

 

अरे! सत्य शाश्वत, प्रकृति में
नर-नारी संबंध,
यह संजय का प्रेमग्रंथ,
मधुरिम जीवन स्कंध।।"

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

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