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"हे! परम अज्ञात,यदि तू है तो..."

 

param agyat

 

 

"हिरण्यकश्यप बन मैं प्रहलादों को कारावास दूँ,
और नरसिंह प्रकट होकर, भक्त को विश्वास दूँ,

 

होलिका बन जल स्वयं,जग को उबारूँ ताप से,
मार्ग दूँ मै सत्य का, जो मुक्त कर दे पाप से,

 

बन के सावित्री, पति को मृत्यु से मैं छीन लूँ,
तो कभी आरोप जग का, मैं अहिल्या दीन लूँ,

 

कंस बनकर मृत्यु से मैं भागता बहुधा फिरूँ,
रक्तबीजों सम कभी मैं काल खप्पर में गिरूँ,

 

मैं कभी यमराज बनकर, हंस हर लूँ जीव का,
तो कभी मैं विश्वकर्मा, रख दूँ पत्थर नींव का,

 

हे! परम अज्ञात, यदि तू है तो मेरी नियति लिख...!"

 

 

 

 

संजय कुमार शर्मा

 

 

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