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हिमालय की गोद में

 

 

-कैप्टन सत्यनारायण पंवार

 


मैने पढा था
हिमालय
अटूट खड़ा है
देश की रक्षामे
साधक है
लेकिन
चण्ड़ाल चीनीयों ने
हिमालय को रोंदा
वतन की राह में
सैनिक शहीद हो गये
सोया भारत जाग उठा
देश की रक् षाहेतु
जवान चल पड़े
मैं भी चल पड़ा
हिमालय की गोद में

 

 

जब सारा देश
श्रान्त, विस्मित जड़ित
सो रहा है
मै निश्चेष खड़ा हूॅ।
तारों से उतरा कोहरा
सफेद भभूतसा
मैं दबे पावों
पहुँचा बंकर में
कुछ थकासा ।
घुसा बिस्तर में
और सोया
हिमालय की गोद में

 

 

प्रातः काल उठकर देखता हूॅ
बरफ, बरफ, बरफ
निकट से दूर से
घुरती सी बरफ
उजली दूध सी बरफ
चारों तरफ
ऐसा दृश्य पहले
कभी दृगों के सामने न आया था।
एक सांस चलती थम गई थी
ऐसा लगता था
मानों
1962 के शहीदों पर
कफन सी बरफ चढी है
शहीद सो रहे है
हिमालय की गोद में

 

 

प्रातः
उठकर देखता हूॅ बरफ चारों तरफ की
उड़ गई है।
गगन में छाया कुहासा
अचानक उड़ गया है।
किरण कोई शक्तिले
चट्टान हिम को छू रही है।
कब्र जैसे फाड़
जीवन झांकता है।
हर जगह
सैनिक संगीन लिए
प्रहरी सा खड़ा है
हिमालय की गोद में।

 

 

 


सत्यनारायण पंवार

 

 

 

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