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कूक उठी हृदयवासिनी कोकिला--डा० श्रीमती तारा सिंह

 

कूक उठी सहसा, हृदयवासिनी कोकिला
करने लगी पुकार, कहने लगी प्राण पिया से
देखो !सुमन– सा विकसा रहनेवाला,ज्योतिपुंज
कैसे निराकार के शून्य में होने चला एकाकार

 

तुम भी निद्रा से जागो
वृथा प्रेम की साध को त्यागो
अम्बुधि अन्तस्तल के बीच छिपा
ध्यानस्थ बैठा है कौन उसे जानो
चारो तरफ़ बिछने वाला है घोर अंधेरा
धरा पर मचने वाला है हाहाकार
चलो देर मत करो , उठो , लो पकड़
उँगली उसकी,हो जाओ भव सागर के पार

 

प्राणी जीवन अर्धसत्य है, पूर्ण सत्य नहीं
बनना चाहते हो अगर पूर्ण सत्य का अमर अंश
तो घोर नीरवता के गहराने से पहले
क्षितिज के पास जो मंद-मंद प्रभा डूब रही
जिसकी करूणा के कम्पन से सिहरती हरियाली पर डाल
ज्योत्सना, धौत सरित तृण तरु बन
प्रतिछवि में रहती जिसकी परिछाहीं, जो
जो तम और प्रकाश से है परे, जिसके आगोश में
मृत पड़े हैं मृत्ति और आकाश
जाकर खोलो, उस अग्यात जगत के स्वामी का द्वार
यहाँ क्यों व्यर्थ लुटा रहे हो, मुक्तामय अश्रु का हार



लहरों का है परिणत यह जीवन
इसमें नहीं सुख का एक भी कण
इसमें मिश्रित है, विकल परमाणु पुंज
नभ, क्षितिज,नीर और अनल
जिससे प्रतिपल भयभीत जीता मन
उर के भीतर रहकर भी क्लांत रहता जीवन
हर क्षण मृत्यु सदृश शीतल निराश
का करती आलिंगन दृष्टि, सोचती
ऊपर नीलिमा व्योम में, जड़ समान पड़ी
दीख रहा जो अंधकार का आवरण
निश्चय ही वहाँ, तप में निरत है कोई तपस्वी
उसी के मौन ध्यान की नीरवता है महाशून्य की
वहीं से प्राणों का पावक पंछी, शुभ्र सुनहली
ग्रीवा मोड़े, आता यहाँ उड़कर
व्यक्त जगत का तीनो काल, भूत-वर्तमान
-भविष्यत बनकर इसी में है प्रविष्ट
यहीं से भयमथित होकर भू समूद्र
हिल्लोलित होता,वहीं से जन धरणी को वरने
समय महाकाल बन धरती पर उतरता
वहीं से नव युग का मानस झंझा रथ पर
चढ़कर, दग्ध धरा पर विचरण करता
शोणित रंजित सर्ग,मनुज का निर्माता यहीं है रहता
वह नहीं होता तो उलट गया होता संसार
शांत धरणी, सभीत फ़टचिट गई होती
रवगुण अंबर मौन हो गया होता, घहर, गरज
धरती की छाती में पड़ गई होती दरार
ज्यों मिट जाती, किरण सारा दिन विहँस कर
लहरों से झिलमिल ,त्यों निज स्वप्नों को लेकर
तुम उससे जा मिल, कर जीवन मृत्ति का उद्धार
गृहपति सदृश यही है तुम्हारे प्राण का प्राणाधार

 

 

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