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इन आखों को अब समझाए कौन ?

 

 

पलकों में जिसको लिए बैठा था,
उसने ही आज इंकार किया,
अपनों से जिनसे दूर खड़ा था,
उन्होंने ही आज झंकार दिया |

 

 

देख देख कर वो मीठी यादें,
अब धुंधलाने सी लगी है,
सुन-सुन कर वो पुरानी बातें,
अब झुठलाने को लगी हैं |

 

 

वही मुस्कराहट वही आहट,
अब सिर्फ सपनो में ही आती है,
वही मीठापन, वही अपनापन,
अब सिर्फ अपनों में ही आती है |

 

 

इन यादों को लिए पलकें बह रही थीं मौन,
सोच रहा हूँ यही की इन आखों को अब समझाए कौन ?

 

 



खड़ा रहा मैं जिसके इंतज़ार में,
उसने तो बस प्रतिकार किया,
जो चाहत पल रही थी मन में,
वैसा ना कभी प्यार मिला |

 

 

ना चाहा तो उस लफ्ज़ को क्यों स्वीकार किया,
क्यों लगाने कलंक उस झूठ का सहारा लिया |
आखिर वो थम जाता उसे किनारा मिलकर,
क्यों ना बहने वो धारा दिया ?

 

 

ख़ामोशी भी थी , चाहत भी था,
ना कभी राहत की कमी थी,
बेताबी का आदी बनाकर,
क्यों सेहत की कमी दी |

 

 

नए बीजों को लिए खड़ा अब भी मुस्कुरा रहा यौवन,
सोच रहा हूँ बस यही बात की, इन आखों को अब समझाए कौन ?

 

 

-शुभम तन्मय

 

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