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इन्कलाब......

 

 

गुजर गए कितने दिन -साल जिन्दगी के
ख़त्म होने नहीं आते, मलाल जिंदगी के

 

चढ़ नहीं सके, जो सियासत की सीढियां
पैर वो खीचते रहे ,दलाल जिन्दगी के

 

चांट रहे थूक को ,अमृत समझकर
कर रहे कुछ लोग, कमाल जिन्दगी के

 

बेच रहे हर गली चौराहे, ईमान यहाँ
बन गए हैं लोग वो ,बवाल जिन्दगी के

 

क्या कभी ख़त्म होगी ? जयचंदों की जमात
ठहरे हुए हैं ये, सवाल जिन्दगी के

 

मायूस होना, नहीं शुमार !हमारी आदत में
काटेंगे एक दिन ये, जाल जिन्दगी के


इन्कलाब तो हमारे लहू का रंग है
जलायेगे इसी से, मशाल जिन्दगी के .....

 



शिव कुमार यादव

 

 

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