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इस शहर में भी

-हरिहर झा

सुना था -
गाँव में
नीम के नीचे का भूत
डरावनी आवाज़ करता है
तब देर रात गये
जंगल को जाती पगडंडी
अचानक
खड़ी हो जाती थी
एक लम्बी सी पुतली की तरह
और समा जाती थी
नुक्कड़ वाली गली पर
सूने खंडहर में ।
पर इस शहर में भी तो
इंसान!
दारू की बोतल में
बन्द हो कर
भूतहा नाच नाचते हैं
अट्टहास करते हैं
जब चढ़ता है उन पर
हाँसिल करने का बुखार
मिर्गी की तरह
तो जूता सुंघाने वाला
कोई नहीं मिलता!
रिश्तेदार तो हैं आसपास
पर प्रेतात्माओं की तरह
अमूर्त रूप में !
जिनकी हड्डियों का
यहाँ प्रवेश वर्जित है
तान्त्रिक की शिष्ट-विधि
के अनुसरण पर ।

लोग अपने ही खून की प्यास लिये
थक कर चूर
लहू-माँस को निबटाते हुये
अपनी लाश पर सुस्ताते हुये
एक कोने में
काच के गोले के निकट
कंकाल-हड्डी पर अंगूठा दबाते हैं
तब प्रगट होती हैं छायाएं…

इधर-उधर
लम्बे डग भरती
भूतयान की चूड़ैल
फुँफकारती
मन्त्र मारने को इधर-उधर !
पर्दे पर मोगरे की मासूम कलि
कुचली जाती देख कर भी
तंत्रियों के भीतर उलझी
उदास डायन खुश नहीं !
जानती है कि सब कुछ अभिनय !
तो भटकती हैं
एक श्मशान से दूसरे श्मशान
(टी. वी. चैनल का रिमोट लिये……)

 

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