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जब विश्व क्रीड़ांगन बनता...

 

 

वह क्या हो सकता...

 

दूर कहीं घनघोर वनों में
सूरज जाकर छिप जाता है।
चन्द्र चाँदनी के अंगों में
सहमा-सहमा जब सोता है।

 

तब घनघोर निशा काली
अट्टहास कर मंडराती है।
मानो शिव छाती पर काली
तांडव करने को आती है

 

सूनी सड़को पर सन्नाटे में
भैया सांय-सांय कुछ होता है
झूठी दुनिया जब सो जाती
अवश्य अघोरी कोई उठता है

 

नीरवता ओढ़े खड़े वृक्ष भी
सिर झीक-झीक कुछ कहते हैं
कोई बैठा उनकी डालो पर,
सोंच नजरें झुका हम लेते हैं।

 

उस वीरानी गली में जाकर
आहट पीछे कदमों की पाते हैं
थोड़ा चल एकाएक जल्दी से
पलट यूँ ही हम देखा करते है।

 

तभी एक झोंका कानों पर
हंस-हंसकर कुछ कह जाता है
आगे खतरा है जाने मे तेजस
समय रात्रि का बतलाता है।

 

धुंध छा जाती है आँखो मे
सब नया नया सा लगता है
स्थिर भी चलायमान होता
जब विश्व क्रीड़ांगन बनता है।

 

किसका क्रीड़ांगन जानू न?
बस ह्रदय तीव्रता बढ़ जाती
जब मैं आँखे अपनी मूँदूँ
सहसा प्रकृति उठकर चलती

 

 

©प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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