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इरोम की चीत्कार

 

भ्रष्टोँ के मंदिर मेँ मत जला चिराग ,
अवलाओँ की कोई नहीँ सुनने वाला चीत्कार ।
किस्मत फूटी जो नारी तन पाई ,
दूर देश तक यौवन दिखलाई ।
घर का भेड़िया को मैँ न भायी ,
पल-पल , कदम-कदम मुझे रुलाया ,
हारकर राजघाट को मंदिर बनाई ।
भ्रष्टोँ के मंदिर मेँ मत जला चिराग ,
अवलाओँ की कोई नहीँ सुनने वाला चीत्कार ।
कई हाथोँ को पुस्तक रुप आई ,
इरोम-इरोम शर्मीला कहलाई ।
सुन भ्रष्ट मन के खुद्दारोँ
बच्छेन्द्री बन कर चोटी लहराई ,
संतोष का नाम जग मेँ दुहराई ,
टेरेसा भारत की मदर कहलाई ।
फिर वैसे हिन्दुस्तान बना दूर देशोँ की आंख जला ,
भ्रष्टोँ के मंदिर मेँ मत जला चिराग ,
अवलाओँ की कोई नहीँ सुनने वाला चीत्कार ।
न - न कहके गिरते जा रहे गंदे धार ,
शर्म - शर्म कहके करते जा रहे शर्मसार ,
पढ़ भगत , राजगुरु , सुखदेव को ,
गुलामी के जंजीड़ो मेँ भरता रहा दहाड़ ,
तेरे जैसे कायरोँ ने मान लिया कर्णधार ।
मत बना एक अवला को मरे गले का हार ,
कांट बन चुभ जायेगी शाम , सुबह हर रात ,
भ्रष्टोँ के मंदिर मेँ मत जला चिराग ,
अवलाओँ की कोई नहीँ सुनने वाला चीत्कार ।

 

 

संजय कुमार अविनाश

 

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