swargvibha banner

होम रचनाकार कविता गज़ल गीत पुस्तक-समीक्षा कहानी आलेख E-Books

हाइकु शेर मुक्तक व्यंग्य क्षणिकाएं लघु-कथा विविध रचानाएँ आमंत्रित

press news political news paintings awards special edition softwares

 

 

दीप, दिया, झालर और लडियाँ; खील, बताशे, रोली की लाली
आओ धूम-धाम से मिलकर, मनायेँ हम झिल-मिल दीवाली !

गीत अधरोँ पे, उमंग मन में, संगीत थिरक रहा पवन में
खुशियों की लहरें, लहर–लहर करती, हर घर के आंगन में !

झालर, तोरण, अनार, फुलझडी; पुश्प, आचमन, अक्षत, रोली
रंग-बिरंगे दीपों की होली, चौखट पर हँसती रंगोली !

देखो तो फुलझरियां चमक दमक फिरकती हैं कैसे
कंगन-बाली-बिंदिया पहने, एक नव-वधु हँसती है जैसे !

चाँद छुपा अमावस में, बोला दीपों और लडियों से
आज तुम्हारी बारी है, मैं तो चमका कई सदियों से !

टिम-टिम करता एक दिया, बोला चुपके से, क्यों है इतना अंधकार
बोली झालर धीमे से, ये CWG का है भ्रष्टाचार !

CWG के स्वर्ण पदकों से, उजाला ही उजाला फैलाना है
CWG के सभी दोषियों को, कडी सजा दिलाना है !

कन्डील बोली मटक-मटक कर, मैं “आदर्श” में कभी ना जाऊँगी
घोटाले की इस आँधी में, मैं झूल कभी न पाऊँगी !

पत्नी बोली, इस बार छुट्टी में, चलो हम चलें कुल्लू-मनाली
आओ धूम-धाम से मिलकर, मनायेँ हम झिल-मिल दीवाली !

मनायेँ हम झिल-मिल दीवाली !

 

 

HTML Comment Box is loading comments...