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चलता हूँ मैं कहाँ अकेला ---डा० श्रीमती तारा सिंह

 

 

चलता हूँ मैं कहाँ अकेला
तुम जो मेरे संग चलती हो
जब टूटने लगते सपने सारे
आश का दीपक जलाती हो
चलता हूँ मैं कहाँ अकेला
तुम जो मेरे संग चलती हो
मेरे प्राणों का अवलंबन बन
दिवा - रात्रि मेरे संग होती हो
मेरे नयन लोक के विरह तम में
ज्योति बन जलती रहती हो
चलता हूँ मैं कहाँ अकेला

 

तुम जो मेरे संग चलती हो
तुम बिन मेरा यह जीवन सूना
सूने में रहता , दुख दूना
लेते ही नाम तुम्हारा, प्रदीप्त
हो उठता, उर का कोना- कोना
तुम नित विविध बंधन में
बंधकर मेरे आँगन रहती हो
चलता हूँ मैं कहाँ अकेला
तुम जो मेरे संग चलती हो

 

तुम जो मेरे संग न चलती
प्रिये ! मेरी पथ - प्रदर्शिका बन
तो जरा भी शंसय नहीं कि
मैं कब का टूटकर बिखर गया होता
मिट जाता होकर कण - कण
तुमने खुद को देवों को किया समर्पित
मेरे लिए तो तुम खुद देवी हो
चलता हूँ मैं कहाँ अकेला
तुम जो मेरे संग चलती हो

 


( मेरे एक मित्र की ओर से, पत्नी की याद में )

 

 

 

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