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कलम के सिपाही

 

 

माना मुश्किलो के दौर हैं ,
तो क्या हुआ ,
वक्त गवाह है ,
आँधियों ने कब दिया है ,
दुआ।
कलम के सिपाही ,
कहाँ खौफ खाते है ,
हर अंधियारे को ,
रौंद
आगे निकल जाते है।

 


डॉ नन्द लाल भारती

 

 

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