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कस रही है

 

 

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 


बन्द कमरे की दीवारें कस रहीं है।
और टांगे दल दलों में घंस रहीं हैं।।
हवा तो माहोल में वे इंतिहां है।
गलें में सांसे हमारी फंस रही है।।
कहीं जाना है कहीं हम जा रहे हैं।
भटकने पर ही फिजायें हंस रही है।।
एक हैं हम, हम को लड़वाने की खातिर।।
बीच कुछ कौमें हमारे बस रहीं है।।
भूल तो तारीख ने की थी मगर अब।
वहीं भूलें हम सभी को डस रहीं है।।

 

 

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