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कटी पतंग

सांझ का समय और , यमुना का किनारा
जो लग रहा था , सभी को प्यारा
मै बैठा निहार रहा था
वातावरण के सोंदर्य को
कि तभी एक कटी पतंग
गिरी यमुना की लहरों में
मैने देखा पतंग लहरों से टकराकर फट गई
और कुछ ही देर मे उसकी हस्ती मिट गई
यह देख मे डूब गया विचारों में
कि क्या मानव भी है एक पतंग
जिसका पलभर मे अस्तित्व मिट जाता है|
सब कुछ जानते हुए भी
मनुष्य है किसी भुलावे में
और पड़ा रहता है स्वार्थ के छलावे मे
वह सोचता है रहूँगा मै अजर - अमर
किन्तु समय आने पर वह जाता है मर
जीते जी बनाता है खुद को मुर्ख
और मरने पर हो जाता है सुर्ख
तभी एक चिड़िया चहकी मेरे कान में
और मै उठकर चला अपनी घर की राह पे
किन्तु खटकता रहा एक प्रश्न मेरे दिमाग में
की इतना ही मनुष्य का अस्तित्व है इस संसार में |

 

 

Kaushal Panday

 

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