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मैं कवि नही

 

 

मैं नया दीवाना इस दुनिया का
कवि कहकर न स्वीकार करो
मन आकांक्षा भरी विद्रोह की
विद्रोही का न तुम सम्मान करो

 

व्याधित करती पीड़ाएँ मन में
रे आशाओं का अम्बार लगा
मैं अंगारों पर उठ खड़ा हुआ
पैरों में छालों का व्यापार लगा

 

अब छाले मुझको नही सोहते है
उस हिमजल की रे आस लगी है
सदियों-सदियों के प्यासे मन को
क्यों वो राह बड़ी उदास लगी है

 

मैं तो अपनी कहता,मन लिखता
तुमने इसे क्यों कविता नाम दिया
स्वछन्द मन के मेरे विचारों को,
कवि के छन्दों का अभिमान दिया

 

हाँ छन्दों में मेरी बात मर जाती है
उस बूढ़ी माँ की देह ढँक न पाती है
सूर्य सहेली भी अनन्त से चल कर
मन अंधकार को मिटा न पाती है

 

 

 

---प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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