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ख़याल

 

 

आते तो हैं वक़्त पे सही,
पल भर में जाते हैं निकल,
रुकते नहीं रोके से ख़याल,
कहीं बना दूँ न इसे ग़ज़ल ।

 

अहाता-ए-दिल को नमी औ'
परेशां रूह को देते हैं सुखन,
मांग कर लफ़्ज़ों से पनाह,
जीते कुछ लम्हों का जीवन ।

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

 

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