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किसका कुसूर था जो इस तरह चल दिये

 

kusoor

 

किसका कुसूर था जो इस तरह चल दिये,
मोत आई भी तो देखो मदीने के दर पे,
माँ ने बोला था चश्मा भी तो लेता जा,
काश रुक कर सुनता बात उसकी,
क्यूँ कि बात चश्में की नहीं थी, आँखों की थी,
उधारी तो रखी थी किसकी चलो ये शिकायत न रही,
देते आये थे मांगने वाले को निवाला,
कुछ भी नहीं था जिसे बोझ का नाम ही देते,
बहुत खुश था कि देखंगे तेरे चेहरे को ऐ मदीने वाले,
उम्र भर के किस्से वहीँ पटड़ी के पास छोड़ आया था,
कुछ भी नहीं लाया था तेरे सजदे के सिवा,
बहुत सुना था तेरे दर पे उजाला है,
दूआये वहीँ पे आके करती है बसेरा,
अब क्या मुहं लेके जाऊँगा घर में,
अब्बू को इतना अब दिखता भी नहीं है,
इस फटे हाल में मुझको पहचाने कैसे,
मेरे गाँव की आज सूरत ही बदल गई होगी,
मैंने रस्ते से किया था वादा,
ले आऊंगा तेरे धानी सी चादर,
किसका कुसूर था जो इस तरह चल दिये,

 

 

 

Pratap Pagal

 

 

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