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क्या है यह ज़िन्दगी?

 

 

सोचती हूँ जब मैं कभी,
क्या है यह ज़िन्दगी!
दिल सिहर उठता है,होती है बैचैनी ,
खुद का पतन देखकर,आँखें हैं भर आती!
मेरे इस अमावस्या से जीवन में न चाँद हैं न तारे,
एक किरण की राह में बीत गए दिन सारे !

 

मैंने भी देखे थे सपने, मेरी भी थी आशाएं,
टूट गए सपने सारे ,चूर हो गयी आशाएं !
अर्थहीन लगती है अब दोस्ती और प्यार,
खाली लगने लगा है अब यह संसार!
पतझड़ में पेड़ भी पत्तों का छोड़ देते हैं साथ,
फिर मेरे दोस्त क्या थामते मेरा हाथ ?

 

हार हार कर हार गयी हूँ ,
प्रश्नों की अजीब पहेली में उलझ गयी हूँ !
असफलता की धुंद में खो गए सपने सारे,
रोशिनी की राह में कितने वसंत काटे!
किसे बताऊँ अपने यह हालात, किस से कहूं दिल की यह बात!
सोचती हूँ जब में कभी,
क्या है यह ज़िन्दगी!

 

 

 

एकता रावत

 

 

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