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कुछ माहिये

 

 

फुरसत दे कुछ ग़म से
रहमत कर इतनी
नाराज़ी क्या हमसे

 

जुल्फों के बूंटे हैं
कांधों के तकिये
ये सँग कब छूटे हैं

 

मौजों का खेला था
दर्द बिछड़ने का
साहिल ने झेला था

 

खुशबू है कुछ ऐसी
तेरी यादों की
ये पुरवाई जैसी

 

पत्थर दिल पाया है
बोलो क्यूँ इतना
हमको तड़फाया है

 

जीवन वो थैला है।
साँसों का जिसने।
बोझा ही झेला है,

 

रातों की पलकों पर
चांदनी बिखरी
झीलों की अलकों पर

 

उठता, गिरता,चलता
जीवन में फिर भी
सपना तो है पलता

 

आँखों को सपना दे
टूटे इस दिल को
कोई तो अपना दे

 

 

आशा पाण्डेय ओझा

 

 

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