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मैक़दा-ए-राज़—–संजय कुमार शर्मा “राज़”


“चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ,
करे जो दिल को तरो-ताज़ा ,वो इन्क़लाब पिएँ ।
पिएँ दरख्तों की छाँव में हम ,उन्हीँ के पत्तों में,
नमूना मेहनत का जो मिलता है श़हद के छत्तों में,
ख़ुदा ! बहती हवा से ,मिट्टी से जो जवाँ रौशन,
हया की साक़ी से ज़मीं-ग़र्दूं का ,हम शबाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब ! कौन सी उसका भी बयाँ ज़रूरी है,
बनी जिसकी भी हो उसका होना जवाँ ज़रूरी है,
बाख़ुदा ! दहशत से आदमी है ,यहाँ टूट चुका,
मरी नसों को कर दे ज़िन्दा वो आफ़ताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
यहाँ तो पानी में भी मुर्दों का ख़ून मिलता है,
ज़िन्दा रहते तक जंगलों का क़ानून मिलता है,
हम तो इन्साँ हैं “राज़” कुछ भी खा-पी सकते हैं,
गिरे जो ग़र्दूँ से ख़ूने “राज़” वो माहताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
हो दिन का वक़्त तो रुख़ पर नक़ाब ले के चलें,
उल्टे-सीधे सवालों के सब ,जवाब ले के चलें,
ये है दुनिया ,कोई भी ,कुछ भी ,कहीं भी बक देगा,
जा के बैठें किसी वीराने में हम ,शबाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब हमदम, मेरी महबूबा ,ये ही अजीज़ मेरा,
मेरा ख़ुदा है ,कोई फ़रिश्ता ,ये ही हफ़ीज़ मेरा,
जहाँ है क़ब्र जहाँ अब दम ये मेरा घुटता है,
गिरे जो ग़र्दूँ से हलावत वो लाज़वाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब लिखी ,ज़िग़र के ख़ूँ से ,जो है हबीब मेरा,
मेरा गुज़रा कल,आने वाला कल औ नसीब मेरा,
ज़माने वाले बड़े तंग़दिल हैं,ये तो पढ़े न लिखे,
रूहानी लफ़्ज़ों में लिखी हम ,कोई क़िताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
उम्र गुज़रे है बग़ैर मय के बड़ी मुश्क़िल से यहाँ,
क्यों नहीं मिलता ग़रीब से वो रईस दिल से यहाँ,
चलो हम तोड़ें ,उंची-नीची औ आड़ी-तिरछी हदें,
एक ही प्याले में बारी-बारी से ,हम नवाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।”

 

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