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मैं कविता तुम कविता जग जीवन है कविता

 

 

मैं कविता तुम कविता जग जीवन है कविता।
मन के भावों का ये निर्मल संवहन है कविता।
प्रियतम के उन अधरों की लालिमा है कविता।
विरही के करुण गीतों की नई प्रतिमा है कविता।

 

नव युगल के मधुर मिलन का संवाद है कविता।
शंकर के डमरू का नवल अनुनाद है कविता।
हृदय से फूटे शब्दों और भाव का मिलन है कविता।
मैं कहता कवि लेखनी का मोहक प्रसून है कविता।

 

समीर की सनसनाहट की आवाज है कविता।
कवि हृदय के तड़िग में खिला सरोज है कविता।
प्रेयसी की घनी घनघोर घटा जैसी है कविता।
कभी राह तकती प्रेयसी की उदासी है कविता।

 

वीर रस की वीरता से मिला अंगार है कविता।
मेरी प्रेयसी का वो किया सोलह शृंगार है कविता।
अब क्या कहूँ अंत में प्रणव क्या नही है कविता?
हो रही विश्व में समस्त साहचर्य क्रिया हैं कविता।

 

 


-----प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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