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मैं ‘मैं’ हूँ

 

 

मैं कौन हूँ ?
क्या हूँ ? क्यों हूँ ?
मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है ?
मेरा कार्य क्या है ?
बड़े जतन से सब पर विचार किया
अपने होने के बारे में
पर कुछ खोज नहीं पाया
फिर सब की तरह
जीने की आदत डाल ली
तो खुद ब खुद एक दिन
सब अपने आप साफ हो गया
कि मैं कौन हूँ ? क्या हूँ ? क्यों हूँ ?

 

 

मैं ‘मैं’ हूँ
मैं मौसम नहीं, पर्व नहीं,
वायु नहीं, जल नहीं,
शीत नहीं, उष्ण नहीं,
मैं ‘मैं’ हूँ।
इस पृथ्वी का ‘मैं’
जो हर ‘तुम’, ‘वह’ और ‘हम’ पर भारी है।
मैं ‘मैं’ हूँ।
और यह विडम्बना
मेरी नहीं बल्कि
तुम सब की है।
क्योंकि तुम सब भी ‘तुम सब’ ही हो,
‘हम’ नहीं।

 

 

मैं दीप नहीं, बाती नहीं,
और न ही कोई तेल हूँ।
मैं ‘मैं’ हूँ।
मैं आक्सीजन हूँ।
मेरा होना या मेरी छवि का होना
तुम्हारे न होने का कारक है।
क्योंकि मैं ‘मैं’ हूँ।
मैं ‘अभिमान’ हूँ।

 

 

मैं धरती नहीं, आसमाँ नहीं,
पहाड़ नहीं, पर्वत नहीं,
विशालकाय समुद्र भी नहीं,
मैं ‘मैं’ हूँ।
और हाँ, इसीलिए ये सब
मेरे अधीन है।
मैं ‘मैं’ हूँ, ‘मैं’ था
और ‘मैं’ ही रहूँगा।
जरूरत थी ‘आप’ को ‘तुम’ से होते हुए
तू तक घसीटने की,
मेरे काबिल बनाने की।

 

 

मैं समाज नहीं, वर्ग नहीं,
जाति नहीं, धर्म नहीं,
ये सब मेरे ही अपघटित ‘स्वरूप’ है।
मैं इनका निर्माता हूँ।
मैं ‘मैं’ हूँ।

 

 

मैं चलता हूँ
जीवन भर साथ उसके
जो दिवालिया स्थिति में दोनों घुटनों के बल
मेरे सामने पड़ा है।

 

 

मैं उसी की
तलाश में रहता हूँ।
जिसे किसी ने नहीं रखा
सदियों से अभी तक

 

 

मैं साथ निभाता हूँ
उसी का,
जो थोड़ी देर बाद
मेरा साथ छोड़कर
कब्र में लेटा पड़ा हो।
क्योकि मैं ‘मैं’ हूँ।

 

 

इस जगत में
मैं माया नहीं, छल नहीं,
प्रपंच नहीं, द्वेष नहीं,
बल्कि मैं मारिच का
सुपरलेटिव फार्म हूँ।
मै इन सब का द्योतक हूँ।
मैं ‘मैं’ हूँ।

 

 

मैं सुनता नहीं ,
सुनाता हूँ।
देखता नहीं,
दिखाता हूँ।
मैं प्रलय नहीं,
प्रलय का कारक हूँ।
क्योंकि मैं ‘मैं’ हूँ।
मैं ‘मानव’ हूँ।

 

 

 

Rakesh Joshi

 

 

 

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