tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






मन

 

 

मन ,
जिसकी सीमाओं का न कोई आदि न अंत,
जिसका विस्तार इस पाताल से उस गगन,
न भूत, न भविष्य, न वर्तमान, न समय का कोई बंधन,
क्या भीतर, क्या बाहर, क्या नीचे, क्या ऊपर,
सभी दिशाओं में हो जिसका आवागमन,
हो नारी या हो नर, हो राजा या हो रंक, हो धनवान या हो निर्धन I
ये मन

 

 

मन
सोच है अपार या चिंताओं का भण्डार,
सुखों का संसार या दुखों का अंबार,
आशा की किरण या निराशा का अंधकार,
साहसी का हथियार या कायर पर हुआ वार,
सकारात्मक की जीत या नकारात्मक की हार I
ये मन

 

 

मन
जैसे गागर में सागर,
जल है अपरंपार परन्तु सब है बेकार,
तरल भी है गरल भी है,
मंथन करो तो सुधा भी है,
जिससे से हो जीवन का उद्धार I
ये मन

 

 

मन
है अगर चंचल तो अचल भी है,
पवन के वेग से गतिमान तो,
शांत सरोवर के जल सा स्थिर भी है I
ये मन

 


नाम: धनेन्द्र कुमार

 

HTML Comment Box is loading comments...