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मंदिर

 

जहाँ वेदों ने विश्राम किया है।
मंत्रो ने नव आयाम लिया है।
शांति मिली जहाँ वहीं तो ,
प्रणव ने नित प्रणाम किया है।

 

वही तो मेरा मंदिर है।

 

देवभूमि सी धरा जहाँ की है,
कैलाश सी आभा जहाँ की है।
लगता मेरे भोले यहीं विराजे,
स्वर्ग सी अनुभूति जहाँ की है।

 

वही तो मेरा मंदिर है।

 

भेदभाव जहाँ खंडित होता है।
प्राणिमात्र में ईश्वर दिखता है।
मर कर जहाँ संजीवनी मिली,
त्रयम्बक वास वहीं होता है।

 

वही तो मेरा मंदिर है।

 

 

प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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