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मंजिलें

 

 


मैं जब भी /

तेज चलता हूं /

मंजिलें दूर जाती हैं
मैं जब भी रुक जाता हूँ /
रास्ते रुक जाते हैं /

 

 

मैं अकसर सोचा करता हूं /
कैसे गुजरुंगा इन राहों से /
मैं फिर भी/ उठ खड़ा होता हूं ये सोचकर/

 

 

कि कल भी कोई राहगीर गुजरा था यहां से /
कल भी गुजरेंगे कई लोग यहाँ /

इसी उम्मीद में अकसर मैं देखा करता हूँ
मेरी कोशिश ज़िन्दगी को भी जीत सकती है।

 

 

 

 

- कवि बृजमोहन स्वामी

 

 

 

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