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अजीब है कि मेरा घर, पानी में डूबा पड़ा है

 

 

अजीब है कि मेरा घर, पानी में डूबा पड़ा है
मेरी आँख का समंदर, फिर भी सूखा पड़ा है।

 


दो वक्त की रोटी भी मयस्सर नहीं उसको
तंगदस्ती की हालत में मेरा बच्चा, भूखा खड़ा है।

 


मैं अपने पैरों को अपनी चादर के अन्दर समेटता कैसे
कि मेरा पैर.... मेरी चादर से दोगुना बड़ा है।

 


अगले साल इसको मरम्मत करवा ही लूँगा
मेरी छत का छप्पर, जो बरसों से टूटा पड़ा है।

 


उम्मीद नहीं आज की रात चूल्हा भी जल पायेगा
आटे की तरह बालन भी.... गीला पड़ा है।

 


मेरी बीवी समझदार है कुछ नहीं कहती
मगर सालों से उसका गला भी, सूना पड़ा है।

 


अब मिट्टी का घोड़ा उसको कहाँ से लाकर दूँगा
मेरा बच्चा हो कर भी, बच्चों सा जिद पे अड़ा है।

 

 

मानव मेहता (मन)

 

 

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