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मिलने वाले

 

मिलने वाले
आजकल
मुझे
सोने
नहीँ देतें,
जो सो भी गया
कहीँ
नजरेँ बचाके
उनसे,
तो फौरन
चले आते हैँ
ख्वाबोँ मेँ मिलने।
ये
हँसाते हैँ
रुलाते हैँ
झगड़ते हैँ
बिगड़ते हैँ
सब के सब
बारी बारी
मुझे
पकड़ते हैँ
और कहते हैँ
ख्वाबोँ से
बाहर निकल!
धरातल पर चल!
मैँ
सहमता हूँ
जागता हूँ
भागता हूँ
और फिर
मुसलसल
भीड़ मेँ
अपने आप को
घिरा पाता हूँ/

 

 

 

 

मनीस पाण्डेय

 

 

 

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