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मित्र विरह

 

 

काल की गति क्यों आज तीव्र लग रही है,
तुमसे बिछड़ने की घड़ी नज़दीक लग रही है I
खोजते हैं स्वयं को जब अपने ही दिल के दर्पण में,
उसके प्रतिविम्ब में भी गुजरे हुए कल की तस्वीर दिख रही है I
तुमसे मिलना जो कभी इस जीवन का उपहार लगता था मुझको,
तुम्हारा बिछड़ना आज उसी जीवन का अभिशाप लग रहा मुझको I
सोचते थे क्या पुण्य किये जो तुम मिले मुझको,
आज विचार आता है क्या पाप किये जो तुम बिछड़ रहे मुझसे I
आज भी वो जगह वही है जहाँ होते थे कभी मेल-मिलाप,
वृक्ष वही हैं, पक्षी वही हैं, पर यह कलरव लग रहा क्यों करुण विलाप I
हो सकता है इस पतझड़ के बाद भी फिर कभी बसंत ऋतू आएगी,
कलियाँ करेंगी अठखेलियां पर महक वो बहार न ला पायेगी I
कभी उषा छिटक जाती थी जिसकी एक खिलखिलाहट से,
आज दिन में साँझ हो गयी उसके जाने भर की आहट से I
होता अगर अश्वमेध का अश्व तो आज उसे भी रोक लेते,
काल के रथ को तो स्वयं ब्रह्मा भी नहीं रोक सकते I
गंगा किनारे खड़े अब तो बस दूर जाती लहरों को निहारते हैं,
न जाने क्यों अब तो अमावस्या की रातों में भी चन्द्रमा की राह देखते हैं I

 

 

 

नाम: धनेन्द्र कुमार

 

 

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