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मुक्ति की आस

 

 

माया मुझको नही सोहाती
प्रभु बन्धन सारे तोड़ चुका
इहलोक और परलोक का
ज्ञान स्वयं में हूँ जोड़ चुका

 

नर नश्वर जीव अविनाशी
बात पते की जानता हूँ
फिर न जाने क्यों छत्ते पर
मधु जीवन ढूँढता हूँ

 

प्रतिपल ठोंकर दुनिया से
स्वार्थ भरा है रिश्तों में
तृष्णा का हूँ आहार बना
देखो पल पल किश्तों में

 

प्रभु शक्ति मिली मुझको
फिर भी शक्तिहीन हूँ
सबकुछ मेरे ही तो अंदर
फिर भी बुद्धिहीन हूँ

 

हे मधुसूदन हे मायापति
मेरा तुम अब उद्धार करो
क्षण भर की माया नगरी
ओ प्रभु भवसागर पार करो

 

 

--प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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