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मुड़कटवा


बाग-बागीचों
खेत-खलिहानों
एकांत स्थानों में
किसी बच्चे के आगमन की बाट जोहता
दिखता नहीं वह कहीं अब कभी
अपने खौफनाक इरादों के साथ

 

नहीं दिखते उसकी हाथों में
कोई खूनी खंजर,तलवार
भयावह सी दिखने वाली दूसरी अन्य चीजें
जिसका इस्तेमाल किया करता था अक्सरहाँ वो

 

वे बोरियाँ भी साथ नहीं दिखतीं उसकी
बच्चों का सर कलम कर
जिसमें वह ले जाया करता
किसी अज्ञात ठिकाने की ओर
नामालूम समय के लिये

 

भारी -भरकम, बेडोल शरीर, कुरुप चेहरा वाले
किसी मुड़कटवा के आने की खबर सुनकर
गाँव में अब नहीं डरते
रत्ती भर भी बच्चे
जिसके आतंक की कहानियाँ सुन कभी झटपट
छुप जाया करते थे अपनी दादी-माँओं की आँचल में

 

दरअसल यह कोई आकृति नहीं
कोई पात्र नहीं
माँ-बहन,दादी-बूआ की कल्पनाओं का
एक ऐसा क्षणभंगूर पात्र हुआ करता

 

जिसकी आड़ में
कुछ हद तक
बच्चे रह पाते
एक दायरे के अन्दर
एक परिधि के अन्दर
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अमरेन्द्र सुमन

 

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