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नफरत-प्रेम 


कृति-मोहित पाण्डेय"ओम" 
 (ये पंक्तिया मैंने तब लिखी  जब उन्होंने हमसे ये जताया की वो हमसे अब नफरत करते है और हमें अहसास हुआ की वो हमारा नाम भी नहीं सुनना चाहते और न ही कोई मेल-मिलाप रखना चाहते है पर मुझ चकोर को आज भी उस चाँद की 'छवि' का इंतजार है जब वो उज्जवल धवल कोमल चांदनी में  प्रणय-लीला में मग्न हो जायेगा ) 

जो अपने थे कभी ,
             वो आज दिली नफ़रत करते है |
और पराये दुनिया वाले ,
             हमसे मुहब्बत करते है  |

ऐसे उम्मीद न थी उनसे ,
             जिन्दा दिल दफ़न हमें करते है|
कह दो मेरे यारों उनसे ,
             कब्र में मुर्दे दफ़न करते है |
हम तो जिन्दा दिल परवाने ,
             जो प्रेम की लौ में जलते रहते है |

दोस्त हमारे हमसे पूछे ,
             बताओ कौन है वो बेवफा |
बस दिल हमने लगाया उनसे,
             यही थी यारों मेरी वफ़ा |

नफरत की सारी हदे उसने तोड़ी ,
             अब तो रचनाओ से भी नफ़रत करते है|
हम कहते है उनसे जो ,
             इतनी नफ़रत हमसे करते है |
नफरत की खातिर ही समझो ,
             कभी याद तो करते है | 

नफरत-प्रेम तो एक पहलु है,
            जैसे रात्रि-दिवा और ऋतू परिवर्तन करते है |
हम तो दुःख में भी हसकर ,
             रहने की हिम्मत रखते है |
गर दिल तुमसे लगाया था ,
             आंसू सहने की हिम्मत भी रखते है |

इतनी नफरत वो हमसे ,
              कैसे कर सकते है |
शायद नफ़रत को प्रेम मानकर ,
              वो हमसे मुहब्बत करते है |

 

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