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यह कहना मैं कछ्छु नहीं मांग्यो

 

 

देख मधुर छवि तोहारी गिरधर,
मोरा बढ़ता जाता प्रेम निरंतर।

 

हृदय स्पंदन संगीत प्रेम का,
मम स्वास बनी तोहारा मन्त्र।

 

तुम भी प्रेमी और मैं भी प्रेमी,
कहो क्या हमरे मध्य अंतर?

 

तू ही अब आस जीवन की,
तू मेरा मस्ज़िद, तू मेरा मंदर।

 

राधा प्रेम तुम्हरो यदि ताल,
तो माधव मोरा प्रेम समंदर।

 

तोरा मधुर नाम मम वाणी में,
मधुर नाम मोरे हृदय अंदर।

 

हे कान्हा! मैं कछु नहीं मांग्यो,
दो प्रेम वही जो मम हृदय अंदर।



कवि परिचय
नाम-दिनेश कुमार 'डीजे'

 

 

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