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नीलकण्ठ

 

 

जब सृष्टि को स्वार्थ सूझते
मोरे महादेव को सब पूजते
देवता मुनि असुर नर गंधर्व
सब कैलाश पर ही जा जूझते

 

सुनाऊँ तुमको बात पुरानी
सुनाती थी जो दादी-नानी
कहती भोला बड़ा भोला रे
वो तो पी जाता विष पानी

 

चतुर सुर-असुर ने मंथन से
हो अमृत का प्रकाट्य किया
मंदराचल को मथनी बना के
वसु को नेती का काम दिया

 

रे रत्न एक हलाहल निकला
जन जीवन को बेहाल किया
उसकी ज्वाला जलन ने मनु
सबको स्वार्थ परिणाम दिया

 

शं शं शं करके सब दौड़ पड़े
शिव चरणं सम्मुख आन खड़े
कल्याण करो कल्याण करो
जाकर के शिव चरणं जकड़े

 

मुस्का कर महेश्वर ने ध्यान में
सब कुछ क्षण भर में देख लिया
उठे मेरे प्रभु जगत् कल्याण को
हलाहल को फिर हथेली लिया

 

उस कालकूट के प्रभाव को
रे प्रभु ने ग्रीवा में शांत किया
विष प्रभाव कंठ नीला पड़ा
जगत् ने नीलकंठ नाम दिया

 

 

 

---प्रणव मिश्र'तेजस'

 

 

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