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श्री श्री पशुपतिनाथ वंदन

 

 

bholenath

 

 

"जय जय हो! भोलेनाथ तुम्हारी,
तुम हो घट-घट वासी,
तुम योगी हो,महातपी हो,
जय जय हो! औघड़ सन्यासी,

 

 

हो त्रिनेत्र तुम,प्रथम नेत्र से
सृष्टि करो,मन मैल धुले,
द्वितीय चक्षु से वरदाता,
संहारक!दृग जब तृतीय खुले,

 

 

विश्वेश्वर!व्याल,विशेष तुम्हें प्रिय,
विश्व-विषय विष स्वयं समेटा,
हे नीलकंठ!नटराज नृत्य कर,
नागराज को गले लपेटा,

 

 

रक्षार्थ जगत,हे उमा महेश्वर!
रत्न हलाहल पान किया,
हे भूतनाथ!तुम काम विजेता,
कर्म-योग-तप-ध्यान दिया,

 

 

तुम प्राणवायु,तुम जल-थल-नभ,
नाड़ी-अस्थि-रुधिर तुम हो,
तुम ज्ञानेन्द्रिय,तुम कर्मेन्द्रिय,
षष्ठेन्द्रिय!मंत्र मदिर तुम हो,

 

 

तुम रुधिर गति,तुम बुद्धि मति,
तुम आज प्राण,तुम कल प्रयाण,
तुम जन्म मेरे, तुम हृद्कम्पन,
तुम साक्ष्य जीव,तुम सत प्रमाण,

 

 

हे भूतेश्वर! तुम आदि-भूत,
भविष्य-अंत ,तुम वर्तमान,
तुम कर्मयोग,तुम ध्यानजोग,
तुम विषयभोग,तुम वर्धमान,

 

 

निर्गुण अल्लाह,सगुण जीसस,
तुम ऋषभदेव,तुम जय जिनेन्द्र,
तुम धर्म इन्द्र,तुम कामदेव,
इच्छा मेरी तुम,जय जितेन्द्र,

 

 

जय जय त्रिदेव!तुम इष्ट देव,
तुम दयावान,तुम क्षमाशील,
तुम बिल्बपत्र,चंदन सुगंध
सागर समीर,तुम मलयानिल,

 

 

हे पशुपति! तुम नेत्र मेरे,
तुम जिह्वा,तुम वाणी हो,
मरघटवासी तुम,मुनि तपस्वी,
भूमि तुम्हीं,तुम पानी हो,

 

 

तुम स्वयं समय,स्थिति तुम्हीं,
गतिमान समुद्र प्रवाल तुम्हीं हो,
तुम जन्म-वृद्धि ,तुम जरा-मृत्यु,
हो कापालिक शिव,काल तुम्हीं हो,

 

 

तुम कण-कण में शंभू! भूतागत,
तुम वर्तमान के समय प्रणेता,
क्षण-क्षण,युग-युग पशुपति प्रवाहित,
कलियुग-द्वापर-सतयुग-त्रेता,

 

 

तुम उत्तर हो,तुम दक्षिण हो,
तुम पूरब-पश्चिम के स्वामी,
नक्षत्र,चंद्र,तारे अपार,
प्रभु कोटि सूर्य तुम अविरामी,

 

 

हे मृत्युन्जय!तुम्हें सुमिर कर
कलम गह लिया हाथ,
हर-हर त्रिपुरारी महादेव!
हर क्षण तुम रहना साथ,

 

 

हे कृपानिधि!कवि-कलम कृपा,
यह प्रेम ग्रंथ मैं गढ़ता हूँ,
तुमने ही संजय नियति लिखी,
वह पत्र,आज मैं पढ़ता हूँ।"

 

 

 

प्रेमग्रंथ - संजय कुमार शर्मा

 

 

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