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जो कल तक पटाखा दिखती थी

 

 

" जो कल तक पटाखा दिखती थी वो आज फुलझड़ी है ,
उसके दिल के तारों से मेरी जुड़ी कड़ाबीन सी लड़ी है ,
वो अपने नैनों के रॉकेट को मेरे दिल पे चलाती है ,
मैं जब कुछ भी बयाँ करूँ तो वो चरखी जैसा घुमाती है ,
अरमानों का अनार अब उसकी छत पे ही चलाऊँगा ,
खुशी से देखेगी वो इसे और फिर वही बिखर जाऊँगा ,
वो फलक पे दिया जला कर बोली , कैसी है आज की दीवाली ,
हाय ये मेरी दीवाली , सुतली बम सी सुलगती दीवाली !

 

 

 

पुष्पेंद्र सिंह कुशवाह ' युवराज '

 

 

 

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