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जहाँ पतझड़ हैं...

 

जहाँ पतझड़ हैं...

 

निर्जन है,
बेरुखी है और सूनी राहें
हाँ, वहीं चला जा रहा हू
जहाँ मन का बोझ हल्का हो
उसी राह पर चल रहा हूँ..
जहाँ पतझङ हैं

 

यूँ टूट कर बिखर गया/ नहीं टूटा तो नहीं हूँ
और बिखरा भी नहीं हूँ
पर बिखेर दिया है मुझे
उसने/ जिसमें सिमटने के लिए/ दुनिया छोड़ दी

 

और खुशियों के उपवन भी छोड़ दिये,
सारे शब्द जाने कहाँ खो गए और/ कहाँ खो गए नाते

 

मत सोच कि मैं फिर से / जोड़ने जा रहा हूँ
मैं अब अनजानी राह पर चल रहा हूँ
जहाँ पतझड़ हैं...
जहाँ पतझड़ हैं...
जहाँ पतझड़ हैं...

 

 

बृजमोहन स्वामी

 

 

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