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प्रदूषण पर दोहे

 

(कवि : महावीर उत्तरांचली)

 

शुद्ध नहीं आबो-हवा, दूषित है आकाश
सभ्य आदमी कर रहा, स्वयं श्रृष्टि का नाश //१//

 

ओजोन परत गल रही, प्रगति बनी अभिशाप
वक़्त अभी है चेतिए, पछ्ताएंगे आप //२//

 

अंत निकट संसार का, सूख रही है झील
दूषित है वातावरण, लुप्त हो रही चील //३//

 

हथियारों की होड़ से, विश्व हुआ भयभीत
रोज़ परीक्षण गा रहे, बरबादी के गीत //४ //

 

नदिया क्यों नाला बनी, इस पर करो विचार
ज़हर न अब जल में घुले, ऐसा हो उपचार //५//

 

आतिशबाजी छोड़कर, ताली मत दे यार
शोर पटाखों का बहुत, होता है बेकार //६ //

 

गलोबल वार्मिंग कर रही, सभी को सावधान
प्रदूषण पर लगाम कस, मत बन तू नादान //७//

 

कुदरत से खिलवाड़ पर, बने सख्त कानून
पहले दो चेतावनी, फिर काटो नाख़ून //८//

 

ऊँचे सुर में लग रहे, जयकारे दिन-रात
शोर प्रदूषण हो रहा, भक्तो की सौगात //९//

 

नियमित गाड़ी जांच हो, तो प्रदूषण न होय
अर्थदण्ड से भी बचे, सदा चैन से सोय //१०//

 

दूषित जल से हो रही, मछली भी बेचैन
हैरानी इस बात से, मानव मूंदे नैन //११//

 

सूखा-बाढ़-अकाल है, कुदरत का आक्रोश
किया प्रदूषण अत्यधिक, मानव का है दोष //१२//

 

 

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