tarasingh
Administrator Dr. Srimati Tara Singh


www.swargvibha.in






प्रकृति की सर्वाधिक मांसल

 

prakriti

 

"प्रकृति की सर्वाधिक मांसल-
रचना तेरे होठ, प्रिए!
जिन्हें देख कर मेरे हृदय में
जाग गया एक खोट, प्रिए!

 

अधरपान करने लालायित,
मेरा हृदय हो गया, प्रिए!
जाग गया उद्दाम युवामन,
शिशु मेरा सो गया, प्रिए!

 

अहा! तेरी निश्छल सुंदरता,
लूट ले गई हृदय मेरा,
लगे अनवरत तेरे स्वप्न से,
चाकर मैं, सुंदरी! तेरा,

 

श्याममेघ मानिन्द केश और
अधर मदभरे लाल,
उलझ गया मनुव्याल पाश में,
अद्भुत रति के जाल,

 

अधर रोम पर स्वेद बूंद,
कहते अधरों से पी लो,
लगे शरद की ओस तृणों पर,
भानु! प्रेम को जी लो,

 

हाय! तेरे अधरों के अंकन मधुर,
मेरे अधरों पर अंकित,
और तेरी श्वांसों के अनुग्रह, लगे
मेरी आत्मा पर टंकित,

 

लगा दहकने मेरा अंकुर,
हृदय शिला पर फूल खिले,
रति-काम मेघ जब टकराए,
वैद्युत जन्मा, दो हृदय मिले,

 

उन्नत जंघे, विकसित नितम्ब,
आकर्षक रति के बाण लगे,
अटका शीर्ष जहाँ शंकु का,
अटके मेरे प्राण लगे,

 

लौकी सी लोई बांहें और
सुन्दर सुतवाँ नाक,
देख अप्सरा की सुंदरता,
मैं रह गया अवाक,

 

भौंचक्का मेरा अबोध, रह गया,
देख रति के उपक्रम,
लाने रंग लगा, शरीर पर,
मेरे नवयौवन का श्रम,

 

नयनबाण जो चले हृदय पर,
नागपाश से जकड़ रहे,
कैसे यंत्र प्रविष्ट देह में,
हृदयमीन को पकड़ रहे,

 

हे भामा! हम नर-नारी, मिल
कर, प्रकृति श्रृंगार करें,
आओ! मत सकुचाओ, कामिनी!
प्यार, प्यार और प्यार करें।।"

 

 

 

 

संजय कुमार शर्मा 'राज़'

 

 

HTML Comment Box is loading comments...